बहुत समय पहले एक कौवा और उसकी पत्नी कहीं दूर से आए और एक पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने लगे। दोनों सुबह दाना चुगने निकल जाते और शाम होने पर वहीं लौट आते। कुछ दिनों तक ऐसा चलता रहा। फिर एक दिन कौवे की पत्नी ने कुछ अंडे दिए। अंडो को देख दोनों बहुत खुश थे।
कौवा: कुछ दिनों में हमारे घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे होंगे!
एक दिन जब वो दोनों दाना चुगकर लौटे तो उन्होने देखा कि कोई उनके सब अंडे खा गया है। ये देखकर दोनों बहुत दुखी हुए।
कौवा: हे भगवान! कोई हमारे सब अंडे खा गया!
उन्होने आसपास रहने वाले चिड़िया और बाकी पक्षियों से भी पूछा। पर किसी को नहीं पता था कि उनके अंडे किसने खाये। कुछ दिनों तक दोनों बहुत दुखी रहे। फिर कुछ समय बाद कौवे पत्नी ने कुछ और अंडे दिए। इस बार दोनों ने तय किया कि वो अंडों का पूरा ध्यान रखेंगे।
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कौवा: आज से हम दोनों में से एक दाना चुगने जाएगा और दूसरा अंडों के पास रहेगा।
कौवा और उसकी पत्नी की तरकीब सफल रही। कुछ दिनों तक उनके अंडों को कुछ नहीं हुआ। फिर एक दिन जब कौवे की पत्नी घोंसले में अंडों के साथ अकेली थी तो उसने देखा कि एक काला साँप रेंगता हुआ उसके घोंसले की तरफ आ रहा है। काले साँप को देखते ही वो समझ गयी कि इस काले साँप ने ही उसके अंडे खाए थे।
कौवे की पत्नी: इस काले साँप ने ही हमारे अंडे खाये थे!
और वो ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी।
कौवे की पत्नी: ये साँप मेरे अंडे खाने आ रहा है! कोई इस दुष्ट साँप को भगाओ!
कौवे की पत्नी मदद के लिए चिल्लाती रही, लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया। और काला साँप उसके सारे अंडे खा गया।
शाम को जब कौवा दाना चुगकर लौटा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी का रो-रो कर बुरा हाल था और अंडे टूटे हुए थे। ये देखकर कौवा हैरानी से उससे पूछने लगा...
कौवा: क्या हुआ? अंडो का ये हाल किसने किया?
कौवे की पत्नी: काले साँप ने! वो वहाँ सामने वाले पेड़ की खोल में रहता है!
ये सुनकर कौवे को बहुत गुस्सा आया। उसने सामने वाले पेड़ की तरफ देखा तो काला साँप अपने बिल के बाहर बैठा था। कौवे ने उससे गुस्से से कहा...
कौवा: काले साँप, अगर तुमने हमारे अंडे खाने बंद नहीं किए तो तुम्हें इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।
काला साँप: कैसा परिणाम? तुम दो कौवे मेरा कुछ नहीं कर सकते, और मैं चाहूँ तो तुम्हें आसानी से खा सकता हूँ। इसलिए मुझे धमकी देना बंद करो। मैं जो चाहूँगा वो करूंगा।
साँप की बात सुनकर कौवे की पत्नी बहुत दुखी हुई और कौवे से कहने लगी...
कौवे की पत्नी: ये सांप कभी नहीं मानेगा। हमें ये घोंसला छोडकर कहीं दूर चले जाना चाहिए।
पर कौवा नहीं माना।
कौवा: हमने कुछ गलत नहीं किया। इसलिए हम कहीं नहीं जाएँगे। अगर यहाँ से कोई जाएगा तो वो काला साँप।
कौवे की पत्नी: पर कैसे?
कौवा: इसके लिए हमें कुछ उपाय सोचना होगा।
ऐसा कहकर दोनों सोचने लगे। तभी कौवा को याद आया...
कौवा: पास ही लोमड़ी मौसी रहती हैं। वो बहुत ही चतुर और समझदार हैं। हमें उनसे मिलने जाना चाहिए।
ये सोचकर दोनों लोमड़ी मौसी के पास पहुंचे और उन्हे सारी कहानी बताई। लोमड़ी मौसी को उनकी कहानी सुनकर बहुत दुख हुआ। वो बोली...
लोमड़ी: काले साँप ने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया है। उसे इसकी सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए।
कौवे की पत्नी: हाँ, पर काला सांप बहुत ताकतवर है। हम उसे नहीं हरा सकते।
कौवा: इसलिए अब आप ही कुछ उपाय बताएं।
इसपर लोमड़ी मौसी कुछ देर सोचकर उनसे बोली।
लोमड़ी: तुम्हारी समस्या का हल मेरे पास है। तुम दोनों कल महल से रानी का मोतीयों का हार चुरा लाना और काले साँप के बिल में डाल देना। तुम्हारा काम हो जाएगा।
कौवे को यह तरकीब समझ नहीं आई। वो हैरान होकर पूछने लगा...
कौवा: सांप को हार देने से उसे दंड कैसे मिलेगा?
इस पर लोमड़ी मुसकुराते हुए बोली...
लोमड़ी: मुझ पर विश्वास रखो।
अगली सुबह कौवा और उसकी पत्नी महल गए। रानी के कमरे में पहुँचकर उन्होनें देखा कि एक कोने में रानी के गहने पड़े थे। उन गहनों में एक मोती का हार भी था। कौवे की पत्नी ने उस मोती के हार को अपनी चोंच में दबाया और उड़ गई। कौवा भी उसके पीछे कांव-कांव करता उड़ गया। सिपाहियों ने ये देखा तो वो भाला लिए उनके पीछे दौड़ पड़े। कौवा और उसकी पत्नी उड़ते हुए सांप के बिल पहुंचे। कौवे की पत्नी ने मोतीयों का हार सांप के बिल में डाल दिया और दोनों उड़कर अपने घोसलें में बैठ गए। पर एक सिपाही ने हार बिल में गिरते देख लिया।
सिपाही: हार इस बिल में है!
ये सुनकर सब सिपाही बिल में भाले मारने लगे। कुछ देर बाद भालो के वार से काला सांप मर गया। कौवा और उसकी पत्नी अपने घोसलें से ये सब देख रहे थे। उन्होने देखा कि उनका दुश्मन काला सांप मर गया है तो उन्होने चैन की सांस ली।
कौवा: लोमड़ी मौसी की सूझबूझ के आगे काले सांप की ताक़त नहीं टिक सकी।
तो बच्चों, इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि दुश्मन कितना भी ताकतवर हो उसे सूझबूझ से हराया जा सकता है
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