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पंचतंत्र की कहानी - चतुर कौआ | Hindi Story City

पंचतंत्र की कहानी - चतुर कौआ


किन्नू नाम के जंगल में बहुत सारे जानवर मिलजुल कर रहते थे। उन्ही जानवरों में एक लोमड़ी भी थी। लोमड़ी की चतुराई के क़िस्से पूरे जंगल में प्रसिद्ध थे और सभी जानवर उससे बहुत सावधान रहते थे। क्योंकि लोमड़ी बहुत बूढ़ी हो गयी थी, इसलिए वह शिकार नहीं कर पा रही थी। जंगल में बहुत घूमने के बाद भी लोमड़ी को कोई शिकार नहीं मिला। वह बहुत थक गयी।

तभी उसकी नज़र थोड़ी दूरी पर एक कछुए पर पड़ी। कछुए को देखते ही लोमड़ी के मुंह में पानी आ गया और वह सोचने लगी, “अरे वाह! आज तो मैं इस कछुए को खाकर ही अपनी भूख मिटाऊँगी। पर मैं इसे पकड़ूँ कैसे? शिकार करने की ताक़त तो मुझ मे बची ही नहीं है। अगर मैं इसके पास गयी तो ये भाग जाएगा। लोमड़ी को एक तरकीब सूझी वह कछुए के पास गयी और बोली, “अरे कछुए भाई ! कैसे हो? बहुत दिनों के बाद दिखे। कहाँ रहते हो आजकल ? मैंने शाम को जंगल में रहने वाले सभी जानवरों के लिए दावत रखी है।  मैं चाहती हूँ कि तुम भी दावत में ज़रूर आओ।


यह सुनकर कछुआ मान गया। कछुआ दावत में जाने से पहले अपने दोस्त कौए के पास गया। कछुए को देखते ही कौआ बोला, “और दोस्त आज कैसे आना हुआ ?” कछुआ बहुत खुश होकर बोला, “आज सुबह मुझे लोमड़ी बहन मिली थी और उन्होंने मुझे दावत पर अपने घर बुलाया है।  उन्होंने मुझे कहा था कि वह सबको दावत का निमंत्र्ण दे रही है।  तो मैंने सोचा तुमसे मिलता हुआ जाऊँ। अगर उन्होंने तुम्हें निमंत्र्ण दिया हो तो दोनों साथ चलेंगे।

इसपर कौवे ने कहा, “ मुझे तो कोई निमंत्र्ण नहीं मिला  … लेकिन।” कछुआ कौवे कि बात सुने बगैर ही चला गया।  कुछ देर के बाद, वह लोमड़ी कि गुफा में पहुंचा और उसने लोमड़ी से पूछा, “अरे! बहन यहाँ तो कोई नहीं दिखाई दे रहा। इसपर लोमड़ी ने कहा, “तुम सही समय पर आये हो। मैं इसी समय भोजन करती हूँ। ऐसा कहकर लोमड़ी ने कछुए को अपने पंजों से दबोच लिया। 

कछुए की मजबूत ढाल होने के कारण लोमड़ी उसे मार नहीं पा रही थी। यह देखकर लोमड़ी उदास हो गयी। कछुए को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे ? वह तो लोमड़ी पर भरोसा करके उसके घर आया था। वह बहुत डर गया था।  तभी कौआ गुफा के अंदर आया और लोमड़ी से कहा, “लोमड़ी बहन, तुम इसे ऐसे नहीं खा पाओगी।  यदि तुम इसे खाना चाहती हो तो कुछ देर के लिए इस कछुए को तालाब में डाल दो जिससे इसकी खाल नरम पड़ जाएगी और तुम इसे आसानी से खा पाओगी। 

इसपर लोमड़ी ने कहा, “वो तो ठीक है, लेकिन तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो ? कौवे ने कहा, “वो इसलिए क्योंकि मैंने बहुत समय से स्वादिष्ट माँस नहीं खाया है । तुम्हारे साथ मैं भी इस कछुए का माँस चख लूँगा। तुम्हारा भी फायदा, मेरा भी फायदा। लोमड़ी कौवे के कहने पर कछुए को तालाब के किनारे जाकर पानी में छोड़ देती है। धीरे-धीरे कछुवा तैरता हुआ तालाब के बीच में पहुँच जाता है।

कौवा हँसते हुए लोमड़ी से कहता है, “हा! हा! हा! क्या हुआ लोमड़ी बहन? कैसा लगा धोखा खा कर? मुझे उम्मीद है कि अब दोबारा तुम किसी के साथ ऐसा करने के बारे में नहीं सोचोगी। इतना सुनकर लोमड़ी कछुए का पीछा करते-करते तालाब के बीच पहुंच जाती है। इतने में एक मगरमच्छ आता है और लोमड़ी को दबोच ले जाता है।

इस तरह, कौवा कछुवे की लोमड़ी से जान बचाता है और लोमड़ी अपनी धूर्ता के कारण मारी जाती है।
 
शिक्षा - हमें मुसीबत के समय हमेशा सूझ-बुझ से काम करना चाहिए।  

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