बहुत समय पहले की बात है एक गाँव में राधेलाल और श्यामलाल नाम के दो मूर्तिकार रहते थे। दोनों ही बेहद सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे, लेकिन उन दोनों में से राधेलाल गाँव में अपने काम के लिए ज्यादा मशहूर था। राधेलाल ऐसी मूर्तियाँ बनाता था जिन्हें देखकर लोगो को उन मूर्तियों के जीवित होने का भ्रम हो जाता था व आस - पास के गाँव में भी राधेलाल की मूर्तियों के बहुत चर्चे थे।
राधेलाल अपनी मूर्तिकार पर बहुत घमंड करता था और एक दिन उसी घमंड में उसने गाँव में एक घोषणा की, “मैं सबसे सुंदर मूर्तियाँ बनाता हूँ क्या इस गाँव या आस - पास के गाँव में कोई भी मूर्तिकार ऐसा हैं जो मेरे से अच्छी मूर्ति बना सकता हैं। अगर कोई ऐसा हैं तो मुझसे मूर्ति बनाने की प्रतियोगिता करे और अगर उसकी मूर्ति मुझसे बेहतर व सुंदर हुई तो मैं उसे एक थैली सोने के सिक्के दूँगा”
राधेलाल की यह बात सुन के गाँव का दूसरा मूर्तिकार श्यामलाल बोला, “मैं बनाऊंगा तुमसे अच्छी मूर्ति, बताओ कब करनी हैं प्रतियोगिता मैं तैयार हूँ।” अगले दिन सुबह वह दोनों मूर्तिकार अपने - अपने औजारों के साथ गाँव के मैदान पर पहुँच गए, जहाँ गाँव वालो ने पहले से दो बड़े पत्थर रखे हुए थे। अब उन दोनों ने मूर्तियाँ बनाने की प्रतियोगिता आरम्भ करी और कुछ समय बीत जाने के बाद दोनों की मूर्तियाँ बन के तैयार हो गयी।
उन दोनों ने ही सुंदर मूर्ति बनाई, लेकिन सबसे अच्छी और सुंदर मूर्ति राधेलाल ने बनाई थी । जिसके बाद राधेलाल ने अपने घमंड में बोला, “मैंने पहले ही कहा था की इस पूरे गाँव में मुझसे अच्छा मूर्तिकार कोई भी नहीं हैं और अब तो यह साबित भी हो गया हैं। मैं ही यहाँ सबसे समृद्ध और सबसे अच्छा मूर्तिकार हूँ। इसपर श्यामलाल ने कहा, “ इतना घमंड अच्छा नहीं होता हैं राधेलाल किसी दिन तुम्हारा यह घमंड तुम्हें ले डूबेगा।”
राधेलाल अपने घमंड में श्यामलाल की बात को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गया। वह और भी ज्यादा घमंड से भरा हुआ रहने लगा। ऐसे ही कुछ समय बीत गया। एक दिन राधेलाल बहुत बीमार पड़ गया था। उसे लगने लगा की उसकी मृत्यु नज़दीक आ गयी व वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा।
तब उसने एक तरकीब सोची और यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने हुबहू अपने जैसी कुछ मूर्तियाँ बनाई और खुद उन मूर्तियों के बीच जा कर खड़ा हो गया। जब यमदूत उसे लेने आए तो एक जैसी इतनी आकृतियों को देखकर दंग रह गए और पहचान न पाये की उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन हैं और सोचने लगे, “यहाँ तो एक जैसी दिखने वाली ग्यारह आकृतियाँ हैं। इसमें से असली कौन हैं और नकली कौन कैसे पहचान की जाये ?”
थोड़ी देर सोचने के बाद भी जब यमदूत को कुछ समझ नहीं आया तो वह फिर सोचने लगे, “अगर आज, मैं मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सका तो यमलोक का नियम टूट जाएगा और अगर सत्य परखने के लिए मैंने इन मूर्तियों को तोड़ा तो कला का अपमान हो जाएगा। आखिर करूँ तो क्या करूँ?”
तभी अचानक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार व घमंड का विचार आया। उसी को परखने के लिये वह मूर्तियों को देखते हुए बोले, “कितनी सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं यह सभी, लेकिन मूर्तियों में एक त्रुटी हैं। काश मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो में उसे बता पाता की उस से यह मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई हैं।”
यह सुनते ही राधेलाल मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा, और वह अपने मन में सोचने लगा, “मैंने अपना पूरा जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया। भला मेरी मूर्तियों में क्या त्रुटी हो सकती हैं।” और यह सोचते ही वह बोल उठा, “कैसी त्रुटी??” इसपर यमदूत बोले, “बस यही त्रुटी हुई तुमसे की तुम अपने अहंकार में बोल उठे क्योंकि बेजान मूर्तियाँ कभी बोला नहीं करती।” यह बोल कर यमदूत राधेलाल को अपने साथ ले गए और राधेलाल को अपने घमंड और अहंकार पर बहुत अफसोस हुआ।
शिक्षा- हमें कभी भी अपनी काबिलियत या कला का घमंड व अहंकार नहीं करना चाहिये।
Comments
Post a Comment